चिराग
जलती बुझती लौं के बीच
बुझने को है।
बुझने के बाद भी
क्या,
उसे चिराग कहलाने का हक़ होगा।
रोशनी नहीं है।
बुझा हुआ चिराग
ख़ुद की उपस्थिति
दर्ज कराने में भी असमर्थ है।
जलते हुए उसने ख़ुद को
ख़ाली किया
किसी और के लिए
जलते हुए की
उसकी अहमियत
अब उसे
स्वयं भी महसूस नहीं होती।
मैं उसे
‘बुझा हुआ चिराग’
कहूंगा अब
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